कंजूस लाला और चतुर ब्राह्मण | Very Funny Stories In Hindi

 कंजूस लाला और चतुर ब्राह्मण | Very Funny Stories In Hindi

कंजूस लाला और चतुर ब्राह्मण | Very Funny Stories In Hindi | funny kahani
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 कंजूस लाला और चतुर ब्राह्मण | Very Funny Stories In Hindi


एक थे लाला दमड़ीदास. जिस तरह अपने किसी गुण या दुर्गुण के कारण कोई आदमी मशहूर हो जाता है, उसी तरह ये लाला अपनी कंजूसी के कारण आस पास के इलाकों में मशहूर थे। कहा जाता था कि अब तक कोई ऐसा माई का लाल पैदा नहीं हुआ, जो लाला की गांठ से फूटी कौड़ी भी निकलवा सकता''““तो इन्हीं लाला को एक दिन एक मामूली से पण्डित ने लूट लिया। किस तरह लूटा, यह एक मज़ेदार कहानी है।
बात यूं हुई कि लाला दमड़ीदास एक दिन नदी स्नान को गए और ऐसे गए कि लगे डूबने। जब वे काफी हाथ-पाँव मार चुके और फिर भी किनारे से काफी दूर रहे तो मजबूर होकर उन्होंने भगवान को याद किया। “हे भगवान अगर तू मुझे किनारे पहुंचा दे तो पचास ब्राह्मणों को भोज करवाऊंगा।' लाला के मुख से ये शब्द निकले ही थे कि एक लहर आई और लाला को किनारे की ओर कुछ दूर धकेल गई। किनारा अब भी काफी दूर था, यानी डूबने का सेंट परसेंट चांस था, फिर भी लाला कुछ संतुष्ट हुए और भगवान्  को फिर स्मरण करके कहा, "हे भगवान, किनारे पर लगा दे मुझे, पच्चीस ब्राह्मणों को भोज करवाऊंगा। '” फिर एक लहर आई और लाला किनारे के कुछ और करीब आ गये', फिर भी डूब सकते थे।  इसलिए उन्होंने फिर एक बार भगवान को याद किया और बोले, “किनारे पहुंच गया तो दस ब्राह्मणों को भोज करवाऊंगा !  'इस तरह कई बार उन्होंने मनौतियाँ कीं और एक के बाद एक लहर उन्हें किनारे की ओर ढकेलती गई। अन्त में जब लाला किनारे पर पहुँच गये तो पचास ब्राह्मणों को भोज कराने का भगवान से किया हुआ उनका वायदा एक ब्राह्मण तक पहुँच चुका था। और जब वे घर पहुंचे तो उन्हें यह सोच-सोच कर पछतावा होने लगा कि ख्वामखाह एक ब्राह्मण को भी भोजन क्‍यों कराएं ? ब्राह्मणों का पेट तो यूँ भी इतना बड़ा होता है कि एक ब्राह्मण दस आदमियों का भोजन अकेले चट कर जाता है।
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 बहुत सोच-विचार के बाद लाला जी ने फैसला कि अब चूंकि उन्होंने भगवान से वायदा कर ही लिया है तो वायदा निभाना भी पड़ेगा, मगर चार फूलकों और सब्जी से ज्यादा ब्राह्मण देवता की थाली में कुछ भी न आने देंगे। भोज के लिए लाला ने अपने गांव के ही एक ब्राह्मण पण्डित घसीटाराम को चुना, इसलिए कि घसीटाराम का पेट दूसरे ब्राह्मणों के मुकाबले में शायद कुछ छोटा था। एक चालाकी लाला ने यह भी की कि भोज के दिन पत्नी को आदेश देकर स्वयं शहर चले गये और सख्ती से कहते गये कि, “खबरदार, पण्डित को चार फुलके से ऊपर एक टुकड़ा भी नहीं देना” ठीक समय पर ब्राह्मण महाशय अपने छोटे से पेट पर हाथ फेरते हुए आए. अब तक यकीन नहीं आ रहा था कि लाला दमड़ीदास ने उन्हें भोज पर बुलाया है. उन्होंने निश्चय कर रखा था कि इस सुनहरे मौके से भरपूर फायदा उठायेंगे, इसीलिए ललाइन जब उनके सामने लाला के आदेशानुसार चार फुलके और थोड़ी सी सब्जी लाई तो बेचारे  सकपका गये। फिर मुंहू बनाकर बोले, “ललाइन, यह भोजन किसी चिड़िया के लिए लाई हो या मेरे लिए ?”  “आप ही के लिए, महाराज, ललाइन झेंपकर बोली, “मगर क्‍या करू, लाला जी ने इससे अधिक कुछ देने के लिए मना किया है.” पण्डित घसीटाराम भी अव्वल नम्बर के चालाक थे।  तुरन्त हंसकर बोले, “ललाइन तुम भी बहुत भोली हो। लाला जी ने चार फुलके देने का हुक्म दिया था, तो इसका मतलब यह थोड़े ही था कि सचमुच चार फुलकों से ही टरका दो ? अरे उनका मतलब तो यह था कि पेट भर के भोजन तो कराना, मगर इतना मत करा देना कि बदहजमी हो जाए. जाओ, कायदे का पकव्रान बनाकर लाओ, और यह भी मत भूलो कि ब्राह्मण को जितना दोगी उतना ही पुण्य पाओगी !”
कंजूस लाला और चतुर ब्राह्मण | Very Funny Stories In Hindi | comedy story in hindi
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दरअसल लाला दमड़ीदास जितने घाघ थे, ललाइन उतनी ही भोली थी। पण्डित जी की बातों के चक्कर में आ गई और वही किया, जो ब्राह्मण देवता कहते गये. बढ़िया-बढ़िया पकवान जितना खा सके खाया, साथ में ढेर सारा बांध लिया। यही नहीं, ललाइन को पाप-पुष्य की ऐसी उलटी-सीधी पढ़ाई कि सौ का एक नोट भी ललाइन ने उनके हवाले कर दिया। और फिर ब्राह्मण देवता ललाइन को खूब सारा आशीर्वाद देने के बाद मूछों पर ताव देते जैसे ही वहां से खिसके, लाला दमड़ीदास शहर से वापस आ गये । वे सोच रहे थे कि पण्डित अब तक रूखा-सूखा खा कर जल भुन कर चला गया होगा। यही सोचकर उन्हें हँसी भी आ रही थी, मगर ललाइन ने जब उन्हें असली कहानी सुनाई और यह भी बताया कि ब्राह्मण देवता भोजन के अलावा सौ का एक नोट भी अपने साथ बांध ले गये तो लाला ने दोनों हाथों से अपना सिर पीट लिया। “अरी, तूने मेरी जनम भर की कमाई गंवा दी!” वे चीखकर बोले, ललाइन की तब भी कुछ समझ न आया कि कहां का गलती हो गई. वह बेचारी लाला को बौखलाहट भरी नजरों से देखती रह गई, और लाला ताल ठोंक कर घर से बाहर निकल आए इस ब्राह्मण के बच्चे को मज़ा चखा कर रहूंगा !” बड़बड़ाते हुए वे पण्डित घसीटाराम के घर की ओर दौड़े। रास्ते में ही उन्होंने दो दो हाथ करने के लिए आस्तीन भी चढ़ा ली। इधर लाला दमड़ीदास घसीटाराम को मज़ा चखाने उसके घर की ओर दौड़े, उधर घसीटाराम अपने घर में दरवाज़े की ओट से बाहर ही देख रहे थे, इसलिए कि उन्हें यकीन था कि लाला  इतना भारी नुकसान हरगिज बरदाश्त नहीं कर सकता। ज़रूर वह उनसे निपटने आएगा। इसीलिए जब उन्होंने दूर पर ही लाला जी को हाथ-पांव फेंकते अपने घर की ओर बढ़ते देखा तो तुरन्त मुकाबले के लिए तैयार हो गए। उन्होंने पहले ही सारी योजना सोच रखी थी। खुद तो वे पलंग पर जाकर लेट गये और पत्नी को सारी बात समुझा बुझा कर बाहर भेज दिया। घसीटाराम की पत्नी ने अपने बाल बिखेर लिये और माथा पीट-पीट कर रोना चीखना शुरू कर दिया। लाला जी ने यह स्थिति देखी तो घबराए। बेचारे अपना ताव भूल गये और बोखलाहट में मुह खोले हुए उसके करीब आकर बोले--“अरी, बात क्‍या है? पण्डित कहां गया ?” “अरे जालिम !” कहकर' पण्डिताइन ने जोर से अपना सिर पीट लिया, “तुमने मुझे कहीं का न रक्खा " इतना कह कर वह और भी जोर जोर से रोने लगी। लाला जी की कुछ भी समझ में न आया। क्‍या सोचकर आए थे वे और क्‍या देख रहे थे। “अरे आखिर मामला क्‍या है ? "लाला ने आश्चर्य से पुछा। " यह तुम पूछते हो ? पुलिस में जाओगे तो सब पता चल जाएगा। तुम ने खाने में मेरे पण्डित को न जाने क्या मिला कर खिला दिया। पेट के दर्द से वे मछली की तरह सारे घर में लोट रहे हैं। हाय ! अब क्‍या होगा !” अब तो लाला जी को सांप सूघ गया। लेने के देंने पड़ गए। वे समझ गये कि खाने के कारण ही पण्डित का यह हाल हुआ होगा ।
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पण्डिताइन बार-बार पुलिस-पुलिस की रट लगा रही थी। लाला को जब कुछ न सूझा तो पण्डिताइन के हाथ में नोटों की एक मोटी सी गड्डी रख दी और गिड़गिड़ा कर बोले, “महाराजिन ! अब तो मेरी इज्जत तेरे हाथ में है।  पुलिस की बात छोड़, जा पण्डित को अच्छे से अच्छे वैद्द को दिखा।”'बड़ी मुश्किल से पण्डिताइन ने वे रुपए लिए, और लाला जी वहां से सीधे मन्दिर की ओर भागे।  और जिस समय पण्डित घसीटाराम अपनी पत्नी के साथ रुपए गिन रहे थे, लाला जी भगवान के सामने गिड़गिड़ा कर कह रहे थे 'भगवान, किसी तरह पण्डित को बचा कर मेरी लाज रख।  बदले में मैं पचास ब्राह्मणों को भोज दूगा। "
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