राजा के कान, गधे के समान !! Hindi Kahani || Hindi Kahaniya || New Hindi Story
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राजा के कान, गधे के समान !! Hindi Kahani || Hindi Kahaniya || New Hindi Story
किसी समय राजनगर नाम का एक शहर था। उस शहर का राजा बड़ा धनवान था। उसके खजाने में हीरे-जवाहरात की भरमार थी। उसके पास फ़ौज भी बेशुमार थी। आस -पड़ोस के सब राजा उसकी धाक मानते थे। संसार में उसे किसी चीज़ की कमी न थी। लेकिन न जाने क्यों, वह राजा हमेशा उदास रहा करता था। मंत्रियों ने बहुत बार उससे इस उदासी का कारण पूछा। रानियों ने भी बहुत प्रयत्न किए। पर किसी को उसकी उदासी का कारण नहीं मालूम हो सका। आखिर लोग हार कर चुप रह गए। असल में उस राजा की उदासी का भेद यह था कि उसके कान गधे के से थे। उस का यह भेद उस राज्य में उस के नाई के सिवा और कोई नहीं जानता था। नाई को अपनी जान का डर था, इसलिए वह भेद छिपाए हुए था | जब्र पहली बार नाई ने राजा क्री हजामत बनाई तभी राजा ने उसे चेता दिया -“अरे ! देख इधर ! मेरे राज़ में कोई यह भेद नहीं जानता। एक तू ही जानता हैं। इसलिए ख़बरदार ! अगर किसी को इस की जरा भी भनक चली तो तेरी जान की खैर नहीं । बोटी बोटी कटवा दूंगा । समझ ग्रया न! ” नाई ने कहा--“ जी हुजूर, सब समझ गया। क्या मेरे बाल-बच्चे नहीं हैं! महाराज बेफिक्र रहें। यह भेद कोई नहीं जान सकेगा ।” महाराज ने खुश हो कर उस को पांच अशर्फियों ईनाम में दीं। महाराज को यह वचन दे कर नाई घर आया | लेकिन उस के पेट में यह बात नहीं पच् सकी | डर के मारे वह किसी से कुछ कह भी नहीं सकता था।बस, क्या था ! उस का पेट फूल-फूल कर कुप्पा बन गया और वह बीमार रहने लगा। उस को बीमार देख उसकी औरत ने एक वैध को बुलाया। वैध ने आकर नाड़ी देखी और थोड़ी देर तक सोच-विचार कर कहा- “देखो, तुम्हारे पेट में कोई भेद छिपा है। इसी से तुम्हारा पेट फूल गया हैं और तुम बीमार पड़ गए हों। तुम किसी से वह भेद खोल दो तो तुम्हारी बीमारी छू-मंतर हो जाय और तुम चंगे हो जाओ। अगर वह कोई बड़ा भारी भेद हो तो, तुम और किसी से न सही, कम से कम अपनी औरत से तो कह दो |
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तुम इतना कर लो, तो सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा |”! बह कह कर वैध जी अपने घर चले गए | नाई की औरत भी वहीँ खडी थी। वैध के चले जाने के बाद उसने पूछा - “ अजी, बह भेद क्या हैं जिस के कारण तुम्हारा पेट फूल गया है! मुझे क्यों नहीं बता देते ! तुम तो जानते हो मेरें पेट में बात कैसे आसानी से पच जाती हैं! बह भेद मुझे बता दो | मैं कसम खाती हैं, किसी को जरा भनक भी नहीं लगने दूंगी। हाँ, नाई क्यों न जानता !, वह अच्छी तरह जानता था कि उसकी बीबी के पेट में कोई बात नहीं पचती। उसकी औरत क्या थी, एक चलती फिरती रेडियो दी 'थी। उस के मारे सारे शहर के नार्कों दम था। उसने कहा - “ हाँ, हाँ, मैं जानता हैँ; तुम बात छिपाने में कितनी होशियार हो। लेकिन मेरा भेद बिलकुछ एक मामूली बात है। इसलिए सबसे अच्छा यही होगा कि मैं जाकर उसी वैध को यह भेद बता आऊँ।” यह कह कर वह वैध के घर चला गया। वैधजी घर पर ही थे। नाई को आते देख कर उन्होंने पूछा - ” क्यों, क्या बात है! तुम यहाँ क्यों आए?! मैं अभी तो तम्हारे यहाँ से आया हैं!” क्या कहूँ वैध जी ! आप तो यह कह कर चले आए कि अपनी औरत से भेद खोल दो । उस समग्र मेरी औरत वहीं खड़ी थी | इसलिए मैं आप से कुछ नहीं कह सका | लेकिन अब कहता हूँ, सुनिए, मेरी औरत के पेट में छोटी सी बात भी नहीं पचती। आप उसको नहीं जानते | नहीं तो वैसी सलाह न देते । और यह तो कोई ऐसा वैसा रहस्य नहीं है। अगर कहीं यह रहस्य खुल गया तो मेरा सिर भुद्टे की तरह उड़ जाएगा। लेकिन मैंने एक अच्छा उपाय सोच लिया है। अगर आप मुझे वचन दें कि यह भेद किसी से नहीं खोलूंगा तो मैं आप ही को बता दूँ ।” वैध ने मुँह बिचकाते हुए कहा-- “जा, जा, आया है बड़ा भेद खोलनेवाला ! जाकर और किसी को ढूंढ ! मैं क्यों नाहक यह बला अपने सिर मोल लू!” “ लेकिन वैध जी ! आप ही बताइए कि मैं और किस को ढूँढू ? कहीं ऐसा न हो कि मैं किसी से यह भेद कह दूँ और वह जाकर सारे शहर में डिंढौरा पीट दे। उस से अच्छा हो अगर आपही कृपा करके मेरा बोझ हल्का कर दें ।” नाई ने गिड्गिड़ाते हुए कहा “नहीं, यह कभी नहीं हो सकता । तुम्हारा भेद सुनने वाला कोई नहीं मिलता है तो मैं क्या करूँ! कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारा भेद सुनते ही मेरा पेट भी फूलने लग जाय ! मैं ऐसा बुद्धू नहीं जो जान बूझकर कर आग में कूद पडू ! जा, जा ! अगर तेरा भेद सुनने बाला कोई नहीं मिला तो जाकर किसी दीवार से पेड़ से या सौंप के बिल से कह दे |”वैध ने चिढ़कर जवाब दिया | नाई ने सोचा--“ वाह! यह तो खूब अच्छी सूझी | सचमुच ही जाकर किसी बांबी में अपना भेद क्यों न खोल दूँ !” यह सोच कर दौड़ता-दौड़ता वह शहर के बाहर चला गया। वहीं नजदीक की झाड़ियों में एक बांबी थी |
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नाई ने चारों ओर देखा तो आस पास आदमी तो क्या कोई पशु-पक्षी भी नजर न आया। बस, उस बांबी से मुंह सटाकर उसने अपने पेट का भेद खोल दिया---“ राजा के कान, गधे के समान |!” इतना कहते ही उसकी छाती पर से मानों एक पहाड़ हट गया। वह बिलकुल चंगा हो कर ख़ुशी ख़ुशी घर लौट आया। नाई ने जिस बांबी में अपना भेद खोला था उसी के उपर कुछ दिन के बाद एक बांसों का झुरमुट उग आया | उसके दो तीन महीने बाद राजा के यहाँ कोई भोज हुआ । उस भोज की चहल-पहल के लिए सब तरह के बाजे बजाने बाले बुलाए गए। उन में से एक बाँसुरी वाला भी था जिस के पास कोई अच्छी बाँसुरी न थी । उसने सोचा--'चलो शहर के बाहर जो बांसों का झुरमुट है उस में एक बांस काट कर एक नयी वांसुरी बना लूँ !” यह सोच कर संयोग से वह उसी बांबी वाले झुरमुट के पास जा पहुंचा और एक बाँस काट कर अच्छी सी बांसुरी बना ली। उस ने वह बांसुरी राजा.के दरबार में बजाने के लिए रख छोड़ी। भोज के दिन वह बांसुरी वाला ठीक समय पर राजमहल में हाजिर हुआ। सब बाजे वालो के बाद उसकी भी बारी आयी और उसने खुशी-खुशी बांसुरी बजाई ।
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लेकिन यह क्या? बांसुरी से एकाएक यह क्या शब्द निकला! 'राजा के कान, गधे के समान ! सारे दरबारी चौंक पड़े और उसकी ओर अचरज से देखने लगे | बांसुरी वाले को काटों तो खून नहीं। उसने फिर बजाया | फिर वही सुर निकला -राजा के कान, गधे के समान !!
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