बुद्धि और अतिबुद्धि | Short Hindi Moral Story With Pictures
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Hindi Moral Story
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बुद्धि और अतिबुद्धि | Short Hindi Moral Story With Pictures
सोमनाथ का ख्याल था कि उसका बेटा सुनंद बड़ा ही बुद्धिमान है । इसलिए वह उसे शहर में निर्मलानंद के यहाँ ले गया और उनसे अनुरोध किया कि वह उसे शिक्षा-दीक्षा दें । क॒छ दिनों के बाद सोमनाथ को शहर जाने का इत्तफ़ाक हुआ । वहाँ उसे अपने बेटे का भी ख्याल आया । और वह उससे मिलने निर्मलानंद के यहाँ पहुंचा निर्मलानंद उसे देखते ही बोले, '' तुम्हारा पुत्र तो अतिबुद्धि वाला है । इसलिए इसे पढ़ाना बड़ा मुश्किल है ।” सोमनाथ के गले यह बात नहीं उतरी । वह बोला, “कहीं गलतफहमी है। मेरा बेटा तो बहुत कुशाग्र है । लगता है आप ही उस पर ठीक से ध्यान नहीं दे पाते होंगे!" गुरु निर्मलानंद सोमनाथ के उत्तर से दुःखी हो उठे । उन्होंने फैसला किया कि सोमनाथ को सुनंद की बुद्धि का परिचय मिलना ही चाहिए । उन्होंने सुनंद को अपने पास बुलाया और बोले, '' सुनो सुनंद, बहुत पहले हमारे देश में ऐसे बुनकर थे जो कमाल की साड़ियाँ बुना करते थे । उन साड़ियों को बड़ी आसानी से दियासलाई की डिबियों में रखा जा सकता था । मेरी बात समझ में आयी?” सुनंद ने 'हाँ' में अपना सर हिला दिया । “अच्छा, अब बताओ तुम्हारी समझ में क्या आया? ” गुरु निर्मलानंद का प्रश्न था । “यही कि उन दिनों दियासलाई की डिबियाँ इतनी बड़ी बना दी जाती थीं कि साड़ियाँ उन में आसानी से समा जाती थीं ।” सुनंद ने फर्राटे से उत्तर दिया । अब सोमनाथ की समझ में आया कि गुरु निर्मलानंद क्या कहना चाहते हैं । उसके सामने बुद्धि और अतिबुद्धि के बीच रहा भेद भी स्पष्ट हो गया । उसने गुरु निर्मलानंद के लिए इस्तेमाल किये गये अपने शब्द वापस लिए और उनसे क्षमा मांगी । फिर उसने उनसे विनती की कि वह किसी तरह उसके बेटे को सही रास्ते पर लायें और उसे शिक्षा देना जारी रखें ।
गुरु से आश्वासन का वचन लेकर ही सोमनाथ अपने घर को लौटा ।
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