नेकदिल हाथी और लालची लकड़हारा | Hindi Kahani New | Short Story On Greed In Hindi
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नेकदिल हाथी और लालची लकड़हारा | Hindi Kahani New | Short Story On Greed In Hindi
बहुत समय पहले की बात है। एक जंगल में एक हाथी रहता था। उसी जंगल में एक शिव जी का मंदिर था। वहीँ वह हाथी रहता था तथा शिव जी की पूजा-अर्चना करता रहता था। काफी समय बीत जाने के बाद एक बार भगवान शंकर माता पार्वती के साथ पृथ्वी भ्रमण कर रहे तो माता पार्वती की दृष्टि उस हाथी पर पड़ी और उन्होंने भगवान् शंकर से कहा " प्रभु ! वह देखिये वह गजराज भी आपका परमभक्त है और सदा आपकी भक्ति में लीन रहता है। आपके इस भक्त का उद्धार कब होगा ? प्रभु गजराज काफी बूढ़े भी हो चुके हैं। अब तो इन्हे इस योनी से मुक्ति मिलनी चाहिए। पार्वती जी की बात सुनकर शंकर ने कहा " उसे मुक्ति अवश्य मिलेगी देवी ! लेकिन समय आने पर ही। समय से पहले विधि अपना विधान नहीं बदलती। तब माता पार्वती ने कहा " प्रभु इन्हे इस समय कुछ तो दे दीजिये। " भगवान् शंकर , माता पार्वती के बार बार आग्रह करने पर गजराज को इंसानो की तरह बोलने और समझने की शक्ति दे दिया। उसके बाद शिव और पार्वती वहां से आगे बढ़ गए। इस घटना के कुछ दिन बाद एक दिन गजराज जंगल में घूम रहा था। तभी उसे रोता हुआ एक युवक दिखाई दिया। उसे रोता देख गजराज उसका कारण जानने के लिए जब उस युवक की ओर बढ़ा। इधर हाथी को अपनी ओर आता देख वह युवक भयभीत हो गया और डरकर वहां से भागने लगा।
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उसे भागते देख गजराज तुरंत रुक गया और वहीँ से बोला " अरे भले मानस , रुक जाओ। तुम्हे मुझसे डरने की कोई जरूरत नहीं है। " बोलता हुआ हाथी को देखकर वह युवक कुछ सोचकर रुक गया। तभी गजराज ने कहा " अरे घबराओ नहीं। तुम्हे रोता देख तुम्हारी मदद के लिए तुम्हारे पास आया हूँ। बताओ मुझे तुम क्यों रो रहे थे ?' कुछ सोचकर युवक ने कहा " मैं एक लकड़हारा हूँ। जंगल पार के गाँव में रहता हूँ। मैं रोज इसी जंगल में लकड़ियां काटने आता हूँ , किन्तु आज जब मुझे नजदीक सूखी लकड़ियां नहीं मिली तो मैं दूर जंगल में निकल आया और रास्ता भटक गया। सांझ होने को है और मुझे सही मार्ग सुझाई नहीं दे रहा है। घर पर मेरे बीवी-बच्चे मेरी राह देख रहे होंगे। " कहकर लकड़हारा पुनः फूटफूटकर रोने लगा। गजराज लकड़हारे को चुप कराता हुआ बोला " बस इतनी सी बात के लिए रो रहे हो भले मानस ! मैं तुम्हारी मदद करूंगा। मैं इस जंगल का एक-एक मार्ग जानता हूँ। इसलिए अब तुम्हे घबराने की जरूरत नहीं है। तुम मेरी पीठ पर सवार हो जाओ मैंने तुम्हे जंगल से बाहर निकाल दूंगा। " उसके बाद गजराज उसे पीठ पर बिठाकर लकड़हारे को जंगल के पार उसके गाँव के किनारे ले आया। फिर दोनों एक दूसरे से विदा होकर अपनी-अपनी रह हो लिए। घर पहुँच कर लकड़हारे ने सारी बात अपनी पत्नी को कह सुनाई।
कुछ दिन बीतने के बाद एक दिन लकड़हारे की पत्नी ने लकड़हारे से अपने लिए एक नथनी लेन को कहा। लकड़हारा नथनी लेने शहर गहनों की एक दूकान पर पहुंचा और नथनी लेने लगा। मानव स्वभाव के कारण वह अन्य भी आभूषणों के दाम पूछने लगा। अंत में उसकी नजर हाथी दांत के कंगन पर पड़ी तो उसने सुनार से पुछा " क्यों भाई ! वह कंगन कितने का है ? सुनार ने कहा " पुरे दस रूपए की है। " तब लकड़हारे ने आश्चर्य से कहा " यह सोने से बनी आभूषणों से भी महंगी क्यों है ? तब सुनार ने कहा " अरे भाई ! इतना आँखे क्यों फाड़ रहे हो ? क्या तुम्हे मालूम नहीं है कि हाथी के दांत अत्यंत दुर्लभ होते है। इस कारण हमारे देश में इसकी कीमत सोने - चांदी से भी महंगी है। तब लकड़हारे ने एक आने में नथनी खरीदी। उसके बाद और खाने-पीने की वस्तुवें खरीदकर वापस घर चला आया। घर पहुंचकर उसने नथनी अपनी पत्नी को दे दी और उसे सारी बात बताई। अगले दिन सुबह-सुबह लकड़हारे की पत्नी ने उससे कहा " एजी , यदि हाथी के दांत वास्तव में सोने- चांदी से अधिक कीमती हैं तो समझ लीजिये कि हमारे भाग्य खुलने वाले हैं। लकड़हारे ने आश्चर्य से पुछा " वह कैसे भागवान ? तब उसकी पत्नी ने कहा " अरे , आप उस दयालु हाथी को भूल गए। यदि किसी तरह हमें उसके दांत प्राप्त हो जाएँ तो हम एक ही दिन में मालामाल हो जायेंगे। तब लकड़हारे ने कहा " ठीक कहती हो भागवान , मैं आज ही उसके पास जाऊंगा। उसके बड़े लम्बे-लम्बे और मोटे-मोटे दांत है मैं उससे अपना दुःखड़ा सुनाकर उससे उसका आधा दांत मांग लूँगा। मुझे विशवास है वह इंकार नहीं करेगा। " कहकर लकड़हारा आरी और कुल्हाड़ी लेकर हाथी से मिलने जंगल की ओर चला गया। कुछ देर बाद जब लकड़हारा गजराज के पास पहुंचा तब गजराज बहुत ही खुश हुआ और उसका खूब आवभगत किया। कुछ देर बाद लकड़हारे ने अपना उदास चेहरा बना लिया जिसे देख गजराज ने पुछा " क्या बात है मित्र ? तुम इतना उदास क्यों लग रहे हो ? तब लकड़हारा और उदास हो गया और कोई उत्तर नहीं दिया। तब गजराज को और चिंता होने लगी और वह बार- बार लकड़हारे से उसकी उदासी का कारण पूछने लगा। गजराज के बार-बार आग्रह पर लकड़हारे ने कहा "ओह्ह ! तुम नहीं मानते मित्र तो सुनो, मैं एक बहुत ही गरीब आदमी हूँ। पिछले तीन दिन से मैं और मेरे परिवार ने कुछ नहीं खाया है और ना ही घर में अन्न का एक दाना है। मित्र तुम्हारें दांत बहुत ही कीमती है। यदि तुम उसमें से आधे मुझे दे दो तो मेरा परिवार खुशहाल हो जायेगा। सुनकर गजराज ने तुरंत कहा " बस इतनी सी बात के लिए तुम इतना झिझक रहे थे। अरे भाई, मुझे तो तुम्हारी सहायता करके प्रसन्नता होगी।
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यह ठीक है की दांतों के कटने से मुझे थोड़ा-सा कष्ट पहुंचेगा, किन्तु उस कष्ट से तुम्हारे घर के सारे कष्ट दूर होतें हैं तो मैं उस कष्ट को उठाने को तैयार हूँ। उसके बाद लकड़हारे ने आरी से गजराज के दोनों दांत आधे-आधे काट लिए और ख़ुशी-खुशी सुनार के दुकान पर उन्हें बेचने चला गया। सुनार दांतों को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने लकड़हारे को पंद्रह हजार देकर दांतों को खरीद लिया। जब लकड़हारे ने अपनी पत्नी को सारी बात बताई और उसे पंद्रह हजार रुपये दिखाए तो वह मारे प्रसन्नता के पागल होकर नाचने लगी। इसके बाद अगले ही दिन से वे घर की काया-कल्प करने में जुट गए।
कहतें हैं ना कि बिना मेहनत किये पैसा मिलने से इंसान की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और वह पैसे की कोई कीमत नहीं समझता। ऐसा ही लकड़हारे और उसकी पत्नी के साथ भी हुआ। वे दोनों हाथों से धन बर्बाद करने लगे। उधर उसकी पत्नी अपने कपड़ों-आभूषणों इत्यादि पर फिजूलखर्ची करती , इधर लकड़हारा आस-पड़ोस में जाकर जुआ खेलता और शराब पीता। और कुछ समय के पश्चात उस फिजूलखर्ची और बुरी आदतों का परिणाम उनके सामने आ गया। उनके घर खाने का एक भी अनाज नहीं बचा। फिर वह उसकी पूर्ति ख़रीदे गए गहने - आभूषणों व घर के बर्तनों सामानों से करने लगे। एक समय के पश्चात् जब वह भी ख़त्म हो तो लकड़हारे की पत्नी ने लकड़हारे से कहा " एजी , मेरे दिमाग में एक उपाय आया है। क्यों ना तुम एक बार फिर उसी हाथी के पास जाकर मदद मांगो। हो सकता है , वह तुम पर रहम खाकर अपने बाकी के दांत भी तुम्हें दे दे। लकड़हारा को यह बात अच्छी लगी और वह उसी समय अपनी आरी लेकर जंगल की ओर हाथी के पास पहुँच गया। दुआ-सलाम करने के पश्चात उसने हाथी से दुःखी स्वर में बोला " मित्र ! इस समय मुझ पर घोरे विपदा आ पड़ी है। घर में खाने को कुछ नहीं है। बीवी-बच्चे सब बीमार पड़े हैं। मैं बड़ी आस लेकर तुम्हारे पास आया हूँ। यदि तुमने मेरी मदद नहीं की तो मैं यहीं आत्मदाह कर लूँगा। तब गजराज ने सहानभूति दिखाते हुए बोला " ऐसा नहीं कहते मित्र ! यदि तुम्हें धन की आवश्यकता है तो तुम मेरे बाकी के बचे हुए दांत भी ले जाओ। लेकिन हाँ , पहले जो तुम मेरे आधे दांत ले गए थे , उससे मिले धन का क्या किया ? इस पर लकड़हारे ने एक झूठी कहानी सुनाते हुए कहा " अब तुम्हे क्या बताऊँ मित्र ! तुम्हारें दांतों के बेचने से जो धन मिला था , उस धन में से आधा तो मैंने अपने कर्जदारों का कर्जा चूका दिया। थोड़े पैसों से मैंने जमीन खरीदी और उसमें खेती करने लगा। लेकिन अभी फसल उग भी नहीं पाया कि घर टूट गया। बस , बाकी का पैसा घर ठीक करने में खर्च हो गया। गजराज वास्तव में बहुत भोला था लकड़हारे की झूठी बात को सच मान लिया और उसे अपने बाकि के बचे हुए दांत देने की बात को स्वीकार कर लिया। लकड़हारे ने तुरंत ही हाथी के दांतों के ऊपर चढ़ी खाल को काटकर उसके दांत जड़ से काँट लिया। दांत काटने के पश्चात् लकड़हारा गजराज का आभार प्रकट कर वहां से सीधा शहर पहुंचा और उसी सुनार को वह दांत भी बेच दिए। पैसे लेने के बाद जब लकड़हारा जाने लगा तब सुनार ने उससे कहा " सुनो भाई ! क्या तुम हाथी के खाल भी ला सकते हो। मैं तुम्हे उस खाल के पुरे एक लाख रुपये दे सकता हूँ। लकड़हारे ने आश्चर्य से कहा " क्या कहा ? एक लाख रुपये ? तब सुनार ने कहा " हाँ भाई , मुझे हाथी के खाल से महाराज के लिए एक विशेष रजाई बनानी है। यदि तुम मुझे दो-चार दिन में ही किसी विशाल हाथी की खाल लाकर दे दो तो मैं तुम्हे एक लाख रुपये से कुछ ज्यादा भी दे सकता हूँ।" तब लकड़हारे ने कुछ सोचकर कहा " वायदा तो नहीं करता हूँ पर कोशिश करूंगा। इतना कहकर लकड़हारा घर चला आया। घर पहुंचकर सारी बात पत्नी को बताई। उसकी पत्नी ने उससे कहा " क्यों ना तुम गजराज से ही उसकी खाल मांग लो। " इस पर लकड़हारे ने कहा " पागल हो ! भला गजराज अपनी जान देकर हमें खाल क्यों देने लगा ?" तब उसकी पत्नी ने कहा " अजी वह मुर्ख भी है और दयालु भी। वह जरूर आपको अपनी खाल दे देगा। आप कोशिश तो करों। " मगर लकड़हारे के ना मानने पर उसकी पत्नी ने फिर कहा " सुनो जी ! मैं भी तुम्हारे साथ उस हाथी के पास चलूंगी। फिर देखना मैं मगरमच्छी आंसू बहाकर कैसे उसे अपने प्राण देने पर विवश करती हूँ। "
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अगले दिन दोनों जंगल में गजराज के पास पहुंचे और खूब ज़ोर-जोर से रोने लगे। गजराज कुछ समझ ही नहीं पा रहा था। काफी देर बाद उन्होंने रोना बंद किया। तब लकड़हारे की पत्नी ने गजराज से कहा " गजराज भइया , आपने कल जो इन्हे अपने दांत दिए थे , उन्हें शहर जाते समय कुछ लुटेरों ने लूट लिया और हमारे घर की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। ये तो आपके पास संकोच के मारे नहीं आ रहे थे। इसीलिए आपको सबकुछ बताने के लिए इनके साथ मुझ बीमार को ही आना पड़ा। " इतना सुनकर गजराज बोला " यह तो तुम्हारे से साथ बहुत ही बुरा हुआ भाभी , लेकिन अब तो मेरे पास दांत भी नहीं बचे हैं , जिन्हे देकर तुम्हारी मदद कर पाता। फिर भी यदि मेरा कोई अंग लेकर तुम्हे धन प्राप्त होता है तो वह अंग मैं तुम्हे ख़ुशी-ख़ुशी दे सकता हूँ। तुम बोलो तो सही। तब लकड़हारे की पत्नी ने हकलाते हुए गजराज से कहा " गजराज भइया, वह.... वह... एक सेठ....! " कहकर लकड़हारे की पत्नी एकदम से चुप हो गई। तब गजराज ने कहा " तुम्हे जो कहना है निःसंकोच कहो भाभी ! तुम दोनों की ख़ुशी के लिए मैं अपने प्राण भी दे सकता हूँ। " तब लकड़हारे की पत्नी ने अपनी योजना सफल होती देख कहा " क्षमा करना भइया ! मैं आपसे आपकी सबसे कीमती वस्तु मांगने जा रही हूँ। एक सेठ ने कहा है कि यदि हम उसे किसी हाथी की खाल लाकर दे दें तो वह हमें काफी धन दे सकता है। " इस बात को सुनकर हाथी ने मन ही मन विचार किया कि " अब तू बूढ़ा हो चूका है गजराज। तेरी जिंदगी है ही कितने दिन की। पर तेरे मित्र व उसके बाल-बच्चों के पास पूरी जिंदगी पड़ी है। क्यों न तू इनके सुख के लिए आज ही प्राण त्याग दे। यदि तू आज मरा तो इनकी जिंदगी संवर जाएगी और इस नेक काम के लिए तुझे पुण्य भी मिलेगा।" यह विचार आते ही गजराज सहर्ष ही तैयार हो गया। गजराज की आज्ञा मिलते ही लकड़हारे ने गजराज के मस्तक पर कुल्हाड़े से वार करने लगा और गजराज ॐ नमः शिवाय कहते हुए अपना प्राण त्याग दिया। परन्तु जैसे ही गजराज के प्राण छूटे वैसे ही कैलाश पर्वत पर अपने स्वामी के साथ बैठी माता पार्वती इस ह्रदय- विदारक दृश्य को देखकर चीत्कार कर उठीं। उनकी चीत्कार सुनकर ध्यान- मग्न बैठे भोले बाबा की तन्द्रा भंग हो गयी। माता पार्वती की आँखों में आँसू देख भगवान् शिव ने पूछा " क्या बात है देवी ! तुम्हारी आँखों में आंसू ? ऐसा क्या कष्ट पहुंचा है तुम्हे ?" तब माता पार्वती ने कहा " आप यहाँ ध्यान लगाए बैठे हैं प्रभु ! और वहां पृथ्वी पर उपकार करते-करते आपके एक भक्त की जान चली गयी। वह देखिये , उन दोनों नीच पति -पत्नी ने अपने स्वार्थपूर्ति के लिए आपके परमभक्त गजराज के प्राण ले लिए। सबकुछ जान-सुनकर भगवान् शंकर क्रोध से भर उठे। अगले ही पल वे क्रोध से ताण्डवनृत्य करने लगे। नृत्य करते-करते उनकी तीसरी आँख खुल गई और उसमें से एक ज्वाला निकली और उस ज्वाला से जंगल में उस स्थान के पेड़ों में आग लग गयी, जहाँ लकड़हारा और उसकी पत्नी हाथी के खाल निकालने में मग्न थे।
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दोनों खाल की चिंता छोड़ अपनी जान बचाने की चिंता में पड़ गए। लेकिन वे अपनी जान नहीं बचा पाए और वे दोनों वहीँ जलकर भस्म हो गये। तब माता पार्वती ने भगवान् शिव से कहा "आपने उन्हें दण्ड तो दे दिया प्रभु! लेकिन गजराज की भयानक मौत को देखकर मेरा मन अब भी अथाह दुःख से फटा जा रहा है। " दुखी मत हो देवी गजराज को गज योनि से मोक्ष मिल गया है। अब वह अगले जनम में राज-घराने में जन्म लेगा और आगे चलकर राजा बनकर राज सुख भोगेगा। " और वास्तव में भोले बाबा की भविष्यवाणी सत्य हुई। गजराज ने उसी देश के राज-घराने में जन्म लिया और आगे चलकर एक प्रतापी और शक्तिशाली राजा बनकर वर्षों तक राज-सुख भोगता रहा। जबकि स्वार्थी और नीच लकड़हारे और उसकी पत्नी को उनका पाप सूअर की योनि में ले गया और वे जीवन भर गंदगी खा कर जीते रहें।
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दोस्तों आपको यह कहानी कैसी लगी। कृपया कमेंट बॉक्स में अपनी राय अवशय लिखे। धन्यवाद
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