अक्ल का व्यापारी | Hindi kahani New | New Hindi Story | New Kahani
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अक्ल का व्यापारी | Hindi kahani New | New Hindi Story | New Kahani
किसी ज़माने में एक गांव में करमचंद नाम का एक आदमी रहता था। उसकी परचून की दूकान थी। अपनी आय से वह किसी तरह अपना और अपने एकमात्र पुत्र रामदास का पेट भरता था। रामदास गांव के ही एक स्कूल में पढता था। पढ़ने-लिखने में वह बहुत ही होशियार था। उसके अच्छे स्व्भाव के कारण शिक्षक और सहपाठी सभी उससे खुश रहते थे। एक दिन दुर्भाग्य से उसके पिता की मृत्यु हो गई, उसका पढ़ना-लिखना बंद हो गया और वह दूकान पर बैठने लगा। एक समय के बाद रामदास को लगने लगा कि इस दूकान से उसका गुजर-बसर करना मुश्किल है तो उसने अपनी दूकान एक सेठ को दो सौ रुपये में बेच दी और उसने मिले रुपयों से परदेश में जाकर कोई छोटा-मोटा धंधा आरम्भ करने की सोची। यही सोचकर एक जहाज में सवार हो परदेश रवाना हुआ। कई दिनों की यात्रा के बाद उसका जहाज एक देश की बंदरगाह से जाकर लगा। रामदास वंहा उतरकर वंहा के कई बाज़ारों का निरिक्षण किया। निरिक्षण के उपरांत रामदास ने विचार किया कि यहाँ बहुत महंगाई है और वह इतने रुपयों से कोई धंधा नहीं कर सकता।
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काफी सोचने विचारने के पश्चात उसने एक बाजार में एक दूकान किराये पर ली और उस पर एक अजीब सा साइन बोर्ड टॉँग दिया, जिस पर लिखा था कि 'अक्ल बेचने की दूकान ' जरूरतमंद तुरंत मिले। वह दूकान में बैठकर फेरीवालों की तरह आवाज़ लगाता और कहता कि " अक्ल ले लो अक्ल" । कुछ लोग उसकी दूकान के आगे खड़े होकर उसकी हंसी उडाने लगे हा... हा...हा... भला अक्ल भी कहीं बिकती हैं ! कितना मुर्ख है यह लड़का, अक्ल की तो अभी इसे खुद ही जरूरत है। रामदास यह सब सुनकर मन ही मन कहने लगा कि "बेशक इस समय हंस लो, लेकिन एक दिन मैं तुमसे अपनी अक्ल का लोहा मनवा के ही रहूंगा। इसी तरह करके कुछ दिन बीत गए परन्तु रामदास निराश नहीं हुआ।
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उसी नगर में एक ब्राह्मण रहता था उसके पास बहुत धन था पर था वह बड़ा कंजूस। उसके लड़के का नाम चंद्रमणि था, लेकिन वह मुर्ख था। एक दिन चंद्रमणि किसी काम से बाजार गया था तभी उसकी नजर रामदास के दूकान पर पड़ी और उसने सोचा कि क्यों न भाव पूछ लू अगर सस्ती मिले तो अपने और अपने बापू के लिए खरीद लू। यही सोचकर वह रामदास के पास पहुंचा और उसने पुछा " क्यों भाई अक्ल कितने मन दिए ? रामदास ने उत्तर दिया कि श्रीमान मैं अक्ल तौलकर नहीं बेचता जितने की कहो उतने की दे दूंगा। चंद्रमणि लगा विचार करने की कितने की अक्ल ले लू कहीं महंगी खरीदने पर बापू की डांट खानी पड़े। काफी सोचने के बाद उसने निर्णय लिया कि क्यों ना एक आने की खरीद ली जाए अगर बापू ने सस्ती कही तो और आकर ले जाऊंगा। कौन सी अक्ल की कमी हुई जा रही है। चंद्रमणि ने एक इकन्नी निकालकर रामदास से एक इकन्नी की अक्ल मांगी। रामदास ने एक इकन्नी लेकर अपने गल्ले में डाली और उसकी तरफ एक कागज बढ़ा दिया जिस पर लिखा था की "जब दो आदमी आपस में लड़ रहे हो तो उसे खड़े होकर देखना बुद्धिमानी नहीं है। चंद्रमणि वह कागज लेकर सीधा अपने पिता के पास गया और पूरी बात बताई। कागज पर लिखी बात पढ़ने के बाद ब्राह्मण गुस्से से आग बबूला हो गया और अपने बेटे की खूब पिटाई की।
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अपने बेटे को मारने पीटने के बाद वह रामदास की दूकान पर पहुंचा और बोला " अरे बेईमान तूने मेरे बेटे को मुर्ख जानकर ठग लिया है। मेरे पैसे वापस कर वरना मैं अभी सिपाहियों को खबर करता हूँ। रामदास ने कहा आप व्यर्थ ही मुझपे नाराज हो रहे हैं। आपका लड़का अपनी इच्छा से अक्ल खरीदकर ले गया था। फिर भी आप चाहें तो मेरी चीज मुझे वापस करके अपने पैसे वापस ले सकते हैं।ब्राह्मण ने वह कागज वापस करते हुए कहा "ले अपनी चीज और दे मुझे मेरे पैसे। इस पर रामदास ने कहा ऐसे नहीं श्रीमान आपको यह लिखकर देना होगा की आपका लड़का मेरी दी हुई शिक्षा को नहीं मानेगा और जहां दो आदमी लड़ते होंगे वहां वह खड़ा होकर लड़ाई देखता रहेगा। ब्रामण ने इससे इंकार करने लगा तो वहां मौजूद लोगो ने रामदास का पक्ष लिया और ब्रामण से कहा लड़का ठीक कह रहा आप उसे लिखकर दे दीजिये और अपने पैसे वापस ले लीजिये। तब ब्राह्मण ने एक कागज पर रामदास का कहा लिखकर रामदास को दे दिया और अपने पैसे वापस लेकर अपने घर चला आया।
उसी देश के राजा की दो रानियां थी। एक दिन दोनों रानियों की दासियाँ बाजार से साग - सब्जी खरीदने गई और एक दासी की निगाह वहां बिक रही तरबूज पर गई, तभी दूसरी दासी की निगाह भी उसी तरबूज पर पड़ी। दोनों एक साथ ही तरबूज वाले से तरबूज मांगने लगी। पहली दासी ने पूछा तरबूज कितने का है ? इस पर दुकानदार ने कहा दो आने का है। पहली दासी ने जैसे ही दुकानदार को पैसे देने चाहे उसी समय दूसरी दासी ने दुकानदार की तरफ तीन आने देकर तरबूज लेना चाहा। इतनी सी बात पर दोनों दासियाँ आपस में लड़ने लगी। उन्हें लड़ता देखकर दुकनदार वहां से भाग निकला। तभी सयोंगवश ब्रामण का लड़का चंद्रमणि वहां से निकला और उन दोनों के झगड़े देखने लगा।
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लड़ते-लड़ते उन दोनों की नज़र चंद्रमणि पर पड़ी, और अपना झगड़ा छोड़कर दोनों दासिया चंद्रमणि के पास आ गयी और उससे कहने लगी "पहली दासी ने कहा सुनिए पंडित जी आप मेरे गवाह है बीच बाजार में इसने जो मेरी दुर्गति की है उसकी गवाही आप को ही देनी होगी !"दूसरी दासी ने भी कहा "पंडित जी आप मेरे भी गवाह हैं। ईश्वर के नाम पर आपको रानी जी के सामने आपको सारी बातें सच-सच कहनी होगी। इतना कहकर दोनों दसिया वहां से चली गयी और चंद्रमणि भी सिर लटकाकर घर आ गया और अपने पिता से सारी बात बताई।
उधर दोनों दासियों ने अपनी अपनी रानी से आकर शिकायत की। तब दोनों रानियों ने चंद्रमणि के पास अपना- अपना पत्रवाहक भेजा। बड़ी रानी ने पत्र में लिखा था की यदि तुमने मेरी दासी के पक्ष में गवाही नहीं की तो अच्छा नहीं होगा - बड़ी रानी। दूसरे पत्र में लिखा था कि "तुम्हे मेरी दासी के पक्ष में ही गवाही देनी होगी वर्ना कुत्ते की मौत मार दिए जाओगे - छोटी रानी।चंद्रमणि संकट में पड़ गया। पिता-पुत्र ने आपस में सलाह की और उन्हौने ने रामदास से सलाह लेना ठीक समझा। तब दोनों रामदास के पास गए और सारा हाल कह सुनाया। सुनकर रामदास बोला "मै सलाह तो दूंगा किन्तु दस रुपए लूंगा।" इसपर दोनों तैयार हो गए और दस रुपए निकलकर रामदास को दे दिए। तब रामदास ने चंद्रमणि से कहा "सुनो भाई तुम राजा के सामने पागल बन जाना और कुछ भी पूछे तो उटपटांग जवाब बक देना। दूसरे दिन चंद्रमणि को दरबार में बुलाया गया और राजा ने जब उससे पूछा कि "बताओ की दोनों दासियों में किस बात पर झगड़ा हुआ था और दोनों में दोषी कौन है। इस पर चंद्रमणि ने कहा कि "ही- - -ही- - -ही- - - महराज यह भी कोई पूछने की बात है ?जब उनमे झगड़ा हुआ है तो दोषी भी उनमे से कोई न कोई होगा ही आप उन दोनों में अभी झगड़ा करा दें, फिर आपको मालुम हो जायेगा की दोषी कौन है।" राजा ने चंद्रमणि को पागल समझा और दरबार से जाने को कहा। चंद्रमणि ख़ुशी -ख़ुशी वापस आ गया। वापस आने के बाद चंद्रमणि को यह डर सताने लगा कि चंद्रमणि तो पागल नहीं है और किसी दिन यह बात राजा को पता चल गई तो फिर क्या होगा। यह सोचकर वह एक बार फिर रामदास के पास पहुंचा और अपनी शंका बताई। रामदास ने कहा " ठीक है मैं तुम्हे इस मुसीबत से भी निकाल लूँगा पर इस बार पुरे सौ रुपए लूँगा।" लाचार ब्राह्मण ने उसे सौ रुपये दिए तब रामदास ने उससे कहा कि किसी दिन राजा के पास जाकर सब सच-सच बता देना।तुम सारी मुसीबत से छुटकारा पा जाओगे। और कुछ दिन बाद मौका पाकर चंद्रमणि राजा के पास जाकर सबकुछ सच-सच बता दिया। राजा उसकी बात सुनकर मुस्कुराने लगे और कहा की तुमने सच में बुद्धि से काम लिया। नि:संदेह यदि तुमने उस दिन पागलपन का ढोंग न रचते तो एक न एक रानी के कोप का भाजन जरूर बन जाते। जाओ हम तुम्हे क्षमा करते हैं। राजा को प्रसन्न जानकर चंद्रमणि ने रामदास की भी बात बता दी जिसे सुनकर राजा ने रामदास से मिलने को कहा और बोला कि हम भी उससे अक्ल खरीदेंगे। अगले दिन राजा ने रामदास को अपने दरबार में बुलावा भेजा जिसे सुनकर रामदास मन ही मन खुश हुआ और राजा के दरबार में पंहुचा। राजा ने रामदास से अक्ल खरीदने की इच्छा जाहिर की। तब रामदास ने राजा से दो लाख रुपए की मांग की जिसे राजा ने मान लिया। फिर रामदास ने एक कागज अपने थैले से निकाल कर राजा को दे दिया। उस कागज पर लिखा था "बिना सोचे समझे और अच्छी तरह विचार किये बगैर कोई कार्य न करें।" राजा ने वह शिक्षा पत्र अपने पलंग पर पावं की तरफ चिपका दी थी।
एक दिन राजा अचानक बीमार पड़ गया। उसका महामंत्री काफी समय से राजा को मारने के फिराक में था, उसे यह समय अनुकूल लगा और उसने यह विचार किया की राजवैध को अपनी तरफ मिलाकर राजा के दवाई में विष मिलाकर राजा को मार दिया जाये। इसी षड्यंत्र को अंजाम देने के लिए उसने राजवैध को अपनी ओर मिला लिया और एक दिन दवाई में विष मिलकर राजवैध को राजा के पास भेज दिया। परन्तु राजा ने जैसे ही दवाई पिनी चाही राजा की दृष्टि उस शिक्षापत्र पर पड़ी और वह कुछ सोचने लगा जिससे राजवैध घबरा गया और सोचा कि कहीं राजा को दवाई की सच्चाई का पता तो नहीं चल गया है।
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यही सोचकर वह राजा के पैर पकड़ कर रोने लगा और राजा को महामंत्री की सारी सच्चाई बता दी। सारी सच्चाई जानकर राजा ने महामंत्री और राजवैध दोनों को कारावास में डाल दिया।
उसके बाद राजा ने रामदास को बुलाया और उसकी प्रसंशा करते हुए सारी कहानी कह सुनाई और रामदास को महामंत्री का पद दे दिया। इस प्रकार रामदास एक उच्च राज्याधिकारी बनकर आराम से जीवन काटने लगा।
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दोस्तों आपको यह कहानी कैसी लगी। कृपया कमेंट बॉक्स में अपनी राय अवशय लिखे। धन्यवाद
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